हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: कोटवार का पद खानदानी विरासत नहीं, नियुक्ति के लिए योग्यता और साफ चरित्र अनिवार्य

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बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक याचिका को खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कि कोटवार का पद कोई निजी संपत्ति नहीं है जिसे उत्तराधिकार में प्राप्त किया जा सके। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि कोटवार की नियुक्ति छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 के तहत एक वैधानिक प्रक्रिया है, जिसमें योग्यता और चरित्र को प्राथमिकता दी जाती है।

क्या है पूरा मामला? यह मामला बेमेतरा जिले के नवागढ़ तहसील स्थित ग्राम गनियारी का है। वहां के तत्कालीन कोटवार खेलनदास पनिका का वर्ष 2010 में निधन हो गया था। उनके निधन के बाद रिक्त हुए पद के लिए उनके पुत्र परदेशी राम और एक अन्य ग्रामीण रामबिहारी साहू ने आवेदन किया था। प्रशासनिक जांच और चयन प्रक्रिया के बाद राजस्व अधिकारियों ने रामबिहारी साहू को अधिक उपयुक्त पाते हुए उनकी नियुक्ति कर दी थी।

परदेशी राम ने इस निर्णय को हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिसमें उनका मुख्य तर्क यह था कि वे पूर्व कोटवार के निकट संबंधी (पुत्र) हैं, इसलिए प्राथमिकता के आधार पर यह पद उन्हें मिलना चाहिए।

अदालत के फैसले के मुख्य बिंदु: हाई कोर्ट ने मामले की समीक्षा के बाद याचिकाकर्ता की दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में निम्नलिखित आधार बताए:

  1. चरित्र और पुलिस रिकॉर्ड: पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ता परदेशी राम के खिलाफ अतीत में शांति भंग करने के मामले दर्ज थे। कोटवार नियमों के अनुसार, उम्मीदवार का चरित्र निष्कलंक होना अनिवार्य है।
  2. आयु सीमा और सेवा काल: याचिका के समय परदेशी राम की उम्र 54 वर्ष थी, जबकि कोटवार की सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष होती है। इसके विपरीत, चयनित उम्मीदवार रामबिहारी साहू की उम्र मात्र 34 वर्ष थी, जिसे लंबी सेवा के लिए बेहतर माना गया।
  3. शैक्षणिक योग्यता: परदेशी राम केवल तीसरी कक्षा तक पढ़े थे, जबकि रामबिहारी साहू पांचवीं पास थे। अदालत ने माना कि बेहतर शिक्षा सरकारी कर्तव्यों के निर्वहन में अधिक सहायक होती है।
  4. वंशानुगत दावे का खंडन: कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि निकट संबंधी होने का लाभ केवल तभी मिलता है जब दो उम्मीदवारों की योग्यताएं बिल्कुल समान हों। इसे जन्मसिद्ध अधिकार के रूप में नहीं देखा जा सकता।
  5. उच्च न्यायालय ने राजस्व मंडल और कमिश्नर के पिछले आदेशों को सही ठहराते हुए कहा कि नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और नियमों के अनुकूल थी। इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि ग्रामीण प्रशासन के इन पदों पर नियुक्ति के लिए अब केवल पारिवारिक संबंध नहीं, बल्कि योग्यता, शिक्षा और साफ-सुथरी छवि ही निर्णायक मापदंड होंगे।

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