पाकिस्तान में अजीबोगरीब मांग: शहबाज शरीफ, आसिम मुनीर और इशाक डार के लिए माँगे गए तीन नोबेल शांति पुरस्कार

नोबेल पुरस्कार

इस्लामाबाद/लाहौर: आर्थिक तंगहाली और आंतरिक चुनौतियों से जूझ रहे पाकिस्तान में एक बेहद चौंकाने वाला राजनीतिक प्रस्ताव सामने आया है। पाकिस्तान की पंजाब विधानसभा में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और उपप्रधानमंत्री इशाक डार को ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ देने की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पेश किया गया है।

प्रस्ताव का मुख्य आधार यह प्रस्ताव पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) के मुख्य सचेतक राणा मोहम्मद अरशद द्वारा सदन में रखा गया। प्रस्ताव में दावा किया गया है कि इन तीनों नेताओं ने अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने और हालिया संघर्ष विराम (Ceasefire) की स्थिति पैदा करने में ‘ऐतिहासिक और कूटनीतिक’ भूमिका निभाई है। सत्ता पक्ष का मानना है कि उनकी इस मध्यस्थता ने न केवल क्षेत्र को एक बड़े युद्ध से बचाया है, बल्कि वैश्विक शांति की स्थापना में भी बड़ा योगदान दिया है।

किसने क्या भूमिका निभाई? पंजाब असेंबली में पेश किए गए दस्तावेजों के अनुसार:

  • शहबाज शरीफ: उन्होंने कूटनीतिक स्तर पर विभिन्न देशों के प्रमुखों से संपर्क साधकर संवाद का रास्ता साफ किया।
  • जनरल आसिम मुनीर: सेना प्रमुख ने कथित तौर पर सुरक्षा और रणनीतिक स्तर पर पर्दे के पीछे रहकर तनाव कम करने के लिए सैन्य कूटनीति का सहारा लिया।
  • इशाक डार: उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री के तौर पर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान का पक्ष रखा और मध्यस्थता की प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाया।

हंसी और आलोचना का पात्र बना प्रस्ताव जैसे ही यह खबर सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आई, पाकिस्तान सरकार की जमकर आलोचना और मजाक उड़ाया जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि जिस देश की अपनी अर्थव्यवस्था कर्ज पर टिकी हो और जो खुद आतंकवाद जैसी समस्याओं से घिरा हो, उसके नेताओं के लिए शांति का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मान मांगना हास्यास्पद है। सोशल मीडिया पर लोग इसे ‘डिप्लोमैटिक कॉमेडी’ करार दे रहे हैं।

क्या है अंतरराष्ट्रीय स्थिति? हालांकि पाकिस्तान का दावा है कि अमेरिका-ईरान तनाव कम करने में उसकी भूमिका अहम रही है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि इसमें चीन और अन्य बड़ी शक्तियों की भूमिका अधिक प्रभावी थी। ऐसे में केवल एक प्रांतीय विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर देने से नोबेल समिति पर कोई प्रभाव पड़ने की संभावना न के बराबर है।

फिलहाल, यह मुद्दा पाकिस्तान की घरेलू राजनीति में चर्चा का विषय बना हुआ है, जहाँ विपक्षी दल इसे सरकार की अपनी छवि चमकाने की एक नाकाम कोशिश बता रहे हैं।

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