नई दिल्ली/बर्न:
मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अमेरिकी प्रशासन को एक बड़ा कूटनीतिक और सैन्य झटका लगा है। स्विट्जरलैंड सरकार ने अपनी प्रसिद्ध ‘तटस्थता की नीति’ (Policy of Neutrality) का हवाला देते हुए संयुक्त राज्य अमेरिका को सैन्य हथियारों के निर्यात पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। स्विस सरकार के इस कड़े रुख ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल पैदा कर दी है।
हथियार निर्यात पर प्रतिबंध का मुख्य कारण
रिपोर्ट्स के अनुसार, स्विट्जरलैंड ने स्पष्ट किया है कि वह युद्ध में शामिल किसी भी पक्ष को युद्ध सामग्री की आपूर्ति नहीं करेगा। स्विस फेडरल काउंसिल ने घोषणा की है कि 28 फरवरी के बाद से अमेरिका को हथियारों के निर्यात के लिए कोई भी नया लाइसेंस जारी नहीं किया गया है। सरकार का तर्क है कि मौजूदा संघर्ष की स्थिति में हथियारों की सप्लाई उनके संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ है।
ऐतिहासिक संदर्भ और नीति
यह पहली बार नहीं है जब स्विट्जरलैंड ने इस तरह का कड़ा फैसला लिया है। इससे पहले 2003 में इराक युद्ध के दौरान भी स्विट्जरलैंड ने इसी तरह के प्रतिबंध लगाए थे। स्विस अधिकारियों का कहना है कि जब तक पश्चिम एशिया में तनाव और सैन्य गतिविधियां जारी रहेंगी, तब तक वे नए हथियार निर्यात को मंजूरी नहीं देंगे। डिफेंस सेक्टर से जुड़े विशेषज्ञों का एक समूह अब लगातार स्थिति की समीक्षा कर रहा है।
डोनाल्ड ट्रंप के लिए कूटनीतिक चुनौती
यह घटनाक्रम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। एक तरफ अमेरिका अपनी सैन्य शक्ति और रणनीतिक बढ़त का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ पुराने सहयोगी देशों का इस तरह पीछे हटना उसकी कूटनीतिक पकड़ पर सवाल उठाता है। हालांकि अमेरिकी प्रशासन की ओर से अभी तक इस पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भविष्य की कुछ रक्षा परियोजनाओं में देरी हो सकती है।
मौजूदा स्थिति और भविष्य
सैटेलाइट तस्वीरों और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मिडिल ईस्ट में अमेरिकी नौसेना की गतिविधियां बढ़ गई हैं, जिससे तनाव और गहराने की आशंका है। स्विट्जरलैंड के इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि वह मानवीय संकट और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में किसी का पक्ष नहीं लेगा।
अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या अन्य यूरोपीय देश भी स्विट्जरलैंड की राह पर चलेंगे या अमेरिका इस कूटनीतिक गतिरोध को सुलझाने में सफल रहेगा। फिलहाल, ट्रंप प्रशासन के लिए यह ‘नो-वेपन डील’ एक बड़ा अवरोध साबित हो रही है।