नई दिल्ली/ढाका: बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान अपनी महत्वपूर्ण भारत यात्रा (7 और 8 अप्रैल) से पहले सुर्खियों में हैं। दिल्ली में कदम रखने से पहले ही उन्होंने अमेरिका को दो टूक जवाब देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि बांग्लादेश अपनी ऊर्जा जरूरतों और रणनीतिक फैसलों के लिए किसी भी बाहरी शक्ति का पाबंद नहीं है।
अमेरिका के साथ गुप्त समझौते की अटकलों को नकारा हाल ही में बांग्लादेश में अमेरिकी राजदूत ब्रेंट टी. क्रिस्टेंसन के साथ मुलाकात के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खलीलुर रहमान ने उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया जिनमें कहा जा रहा था कि बांग्लादेश और अमेरिका के बीच कोई गुप्त समझौता हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जो भी समझौते हुए हैं, वे सार्वजनिक हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ऊर्जा सहयोग के कुछ तकनीकी पहलुओं को गोपनीयता के कारण साझा नहीं किया जा सकता, लेकिन अमेरिका ने बांग्लादेश की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहयोग का आश्वासन दिया है।
ऊर्जा संकट पर सख्त रुख ऊर्जा आयात के मुद्दे पर मंत्री ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि बांग्लादेश ऊर्जा के लिए कई विकल्पों की तलाश कर रहा है। उन्होंने कहा, “हम किसी के दबाव में नहीं हैं और सबसे किफायती विकल्पों से तेल और ऊर्जा की खरीद करेंगे।” यह बयान वैश्विक भू-राजनीति के बीच बांग्लादेश की स्वतंत्र विदेश नीति को रेखांकित करता है।
भारत यात्रा और द्विपक्षीय वार्ता के मुख्य मुद्दे शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद यह किसी बांग्लादेशी विदेश मंत्री की पहली भारत यात्रा होगी। इस यात्रा को भारत और बांग्लादेश के बीच पटरी से उतरे रिश्तों को फिर से मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, दिल्ली में होने वाली इस द्विपक्षीय वार्ता में निम्नलिखित अहम मुद्दों पर चर्चा हो सकती है:
- गंगा जल संधि: 1996 की गंगा जल संधि को दिसंबर 2026 की समय सीमा से पहले रिन्यू करने पर बातचीत को तेज करना।
- ऊर्जा सहयोग: दोनों देशों के बीच बिजली और ईंधन के आदान-प्रदान को लेकर चर्चा।
- वीजा सेवाएं: अंतरिम सरकार के दौरान प्रभावित हुई वीजा सेवाओं को सामान्य बनाना।
- क्षेत्रीय संघर्ष: पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध और उसके प्रभाव पर चर्चा।
कूटनीतिक महत्व खलीलुर रहमान का भारत आना इस बात का संकेत है कि नई दिल्ली भी ढाका की नवनिर्वाचित सरकार के साथ नए सिरे से जुड़ने के लिए तैयार है। यह यात्रा न केवल भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर बांग्लादेश की संप्रभुता को लेकर दिए गए उनके बयानों ने दक्षिण एशिया की राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है।