उच्चतम न्यायालय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अजमेर शरीफ दरगाह के लिए भेजी जाने वाली ‘चादर’ के खिलाफ दायर एक याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि इस प्रकार की याचिकाएं न्यायपालिका के समय की बर्बादी हैं और कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं हैं।
क्या था याचिका का मुख्य आधार?
यह याचिका एक सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा दायर की गई थी, जिसमें तर्क दिया गया था कि प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा किसी विशेष धार्मिक स्थल पर चादर भेंट करना भारत की धर्मनिरपेक्ष (Secular) छवि और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि सार्वजनिक धन या सरकारी प्रभाव का उपयोग किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या परंपरा को बढ़ावा देने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता के दावों में कोई दम नहीं पाया। पीठ ने कहा कि भारत एक ऐसा देश है जहां विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों का सम्मान किया जाता है। प्रधानमंत्री द्वारा ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर चादर भेजना एक पुरानी परंपरा है, जो सद्भावना और सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है। अदालत ने टिप्पणी की कि याचिका में कोई कानूनी आधार नहीं है और यह “विचार योग्य” (Not Tenable) नहीं है, जिसके बाद इसे तत्काल प्रभाव से खारिज कर दिया गया।
अजमेर दरगाह और चादर की परंपरा
उल्लेखनीय है कि हर साल ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के ‘उर्स’ के अवसर पर देश के प्रधानमंत्री की ओर से दरगाह पर चादर चढ़ाई जाती है। यह परंपरा दशकों से चली आ रही है और इसे भारत की मिली-जुली संस्कृति (गंगा-जमुनी तहजीब) के हिस्से के रूप में देखा जाता है। इस बार भी प्रधानमंत्री मोदी ने उर्स के लिए चादर सौंपी थी, जिस पर विवाद पैदा करने की कोशिश की गई थी।