: रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) की गुजरात स्थित जामनगर रिफाइनरी एक बार फिर वैश्विक चर्चाओं और विवादों के केंद्र में है। हालिया रिपोर्ट्स में कंपनी द्वारा रूस से भारी मात्रा में कच्चे तेल (Crude Oil) के आयात को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, खासकर यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के संदर्भ में।
विवाद की मुख्य वजह क्या है?
यूक्रेन संकट शुरू होने के बाद से पश्चिमी देशों ने रूस की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के लिए उसके तेल निर्यात पर कई कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। हालांकि, भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदना जारी रखा है। रिलायंस इंडस्ट्रीज, जो दुनिया के सबसे बड़े रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स में से एक का संचालन करती है, इस रियायती रूसी तेल की एक बड़ी खरीदार बनकर उभरी है। विवाद तब गहराया जब कुछ अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने आरोप लगाया कि जामनगर रिफाइनरी में प्रोसेस्ड रूसी तेल को ‘इंडियन ब्लेंड’ बताकर फिर से यूरोपीय और अमेरिकी बाजारों में भेजा जा रहा है, जिससे प्रतिबंधों का उल्लंघन हो सकता है।
रिलायंस का पक्ष और रणनीतिक स्थिति
रिलायंस इंडस्ट्रीज ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि उसके सभी व्यावसायिक लेनदेन अंतरराष्ट्रीय कानूनों और प्रतिबंधों के पूर्ण अनुपालन (Compliance) में हैं। कंपनी का तर्क है कि कच्चे तेल का प्रसंस्करण (Processing) एक जटिल प्रक्रिया है और उत्पादित ईंधन भारतीय निर्यात नियमों के तहत आता है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि रूस से सस्ते तेल के आयात ने न केवल रिलायंस के मार्जिन में सुधार किया है, बल्कि भारत को वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक रणनीतिक बढ़त भी दी है।
अंतरराष्ट्रीय दबाव और आर्थिक प्रभाव
पश्चिमी मीडिया और कुछ मानवाधिकार समूहों द्वारा यह मुद्दा बार-बार उठाया जा रहा है कि भारतीय निजी रिफाइनरियां रूसी युद्ध तंत्र को परोक्ष रूप से वित्त पोषित कर रही हैं। हालांकि, भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों और जनता को सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। जामनगर रिफाइनरी की उच्च दक्षता इसे रूसी कच्चे तेल को उच्च गुणवत्ता वाले डीजल और जेट ईंधन में बदलने की अनुमति देती है, जिसकी मांग अभी भी पश्चिम में बनी हुई है।