देश में बढ़ते आवारा कुत्तों के हमलों और उनसे जुड़ी समस्याओं पर सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। इस दौरान जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने कुत्तों के व्यवहार (Behavior) को लेकर कुछ ऐसी टिप्पणियां कीं, जो अब सोशल मीडिया और कानूनी गलियारों में चर्चा का विषय बन गई हैं। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने न केवल कानूनी पहलुओं पर गौर किया, बल्कि पशुओं के मनोविज्ञान पर भी अपनी राय साझा की।
‘डर और कुत्तों का व्यवहार’: जस्टिस नाथ का तर्क
सुनवाई के दौरान जब आवारा कुत्तों के काटने और लोगों में बढ़ते खौफ का मुद्दा उठा, तो जस्टिस विक्रम नाथ ने एक व्यक्तिगत अनुभव या सामान्य धारणा के तौर पर कहा, “आमतौर पर कुत्ते उन्हीं लोगों को काटते हैं जो उनसे डरते हैं या भागने की कोशिश करते हैं।” उन्होंने आगे तर्क दिया कि यदि कोई व्यक्ति शांत खड़ा रहे या साहस दिखाए, तो कुत्ते अक्सर पीछे हट जाते हैं। कोर्ट का संकेत इस ओर था कि कुत्तों के आक्रामक व्यवहार के पीछे मानव प्रतिक्रिया भी एक बड़ा कारक होती है।
कानूनी बहस और सुरक्षा का सवाल
अदालत में याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि देश के कई हिस्सों में आवारा कुत्तों का आतंक इतना बढ़ गया है कि बच्चों और बुजुर्गों का सड़कों पर निकलना दूभर हो गया है। जवाब में पीठ ने कहा कि यह एक जटिल मानवीय और पारिस्थितिक मुद्दा है। चर्चा के दौरान पशु प्रेमियों के अधिकारों और आम नागरिकों की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
व्यवहार पर चर्चा का महत्व
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल कानून बना देने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि कुत्तों के व्यवहार को समझना भी जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि नसबंदी और टीकाकरण जैसे उपायों के साथ-साथ लोगों को यह भी सिखाना चाहिए कि संकट की स्थिति में कुत्तों के साथ कैसा व्यवहार किया जाए। कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए आगे की सुनवाई के लिए समय नियत किया है।