पश्चिम बंगाल में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की हालिया कार्रवाइयों ने राज्य की राजनीति में उबाल ला दिया है। राज्य में विभिन्न मामलों को लेकर चल रही ED की छापेमारी और कानूनी तनातनी के बीच ममता बनर्जी सरकार ने अब देश की शीर्ष अदालत, सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक ‘कैविएट’ (Caveat) दाखिल की है, ताकि किसी भी संभावित कानूनी मोड़ पर उनका पक्ष सुने बिना कोई एकतरफा आदेश पारित न हो सके।
क्या है पूरा मामला?
पश्चिम बंगाल में पिछले कुछ महीनों से राशन घोटाला, शिक्षक भर्ती घोटाला और नगर पालिका भर्ती जैसे कई मामलों में केंद्रीय एजेंसियां लगातार सक्रिय हैं। ED ने हाल ही में कई रसूखदार नेताओं और ठिकानों पर छापेमारी की है। राज्य सरकार और सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस (TMC) का आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिशोध के लिए किया जा रहा है।
सरकार ने क्यों दायर की कैविएट?
सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल करने का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि प्रवर्तन निदेशालय या कोई अन्य पक्ष इस मामले में कोई विशेष याचिका दाखिल करता है, तो अदालत कोई भी अंतरिम आदेश देने से पहले पश्चिम बंगाल सरकार का पक्ष जरूर सुने। यह कदम कानूनी विशेषज्ञों द्वारा एक “सुरक्षात्मक उपाय” के रूप में देखा जा रहा है ताकि एजेंसी की कार्रवाई पर सरकार अपना तर्क मजबूती से रख सके।
केंद्र बनाम राज्य: बढ़ता टकराव
पश्चिम बंगाल और केंद्र सरकार के बीच जांच एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र को लेकर लंबे समय से खींचतान चल रही है। राज्य सरकार का तर्क है कि कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है और बिना राज्य की सहमति या उचित कानूनी प्रक्रिया के केंद्रीय एजेंसियों का हस्तक्षेप संघीय ढांचे के खिलाफ है। वहीं, ED का दावा है कि उनके पास भ्रष्टाचार के पुख्ता सबूत हैं और वे केवल अदालत के निर्देशों और कानूनी दायरे में काम कर रहे हैं।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट में इस कैविएट के दाखिल होने के बाद अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या आने वाले दिनों में बंगाल में जारी जांच की दिशा बदलेगी। यह कानूनी दांवपेंच ममता सरकार की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वह केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई को कानूनी रूप से चुनौती देना चाहती है।