वैश्विक भू-राजनीति में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने एक बड़ा सैन्य कदम उठाया है। अमेरिकी रक्षा विभाग ने अपने शक्तिशाली विमानवाहक पोत ‘यूएसएस अब्राहम लिंकन’ (USS Abraham Lincoln) को विवादित क्षेत्र में तैनात कर दिया है। इस तैनाती को ईरान और उसके समर्थित गुटों के खिलाफ एक कड़ी चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। इसी बीच, नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों ने इस चर्चा को और हवा दे दी है कि आने वाले समय में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति और अधिक आक्रामक हो सकती है।
यूएसएस लिंकन की तैनाती का महत्व
‘यूएसएस अब्राहम लिंकन’ केवल एक जहाज नहीं, बल्कि समुद्र में तैरता हुआ एक अभेद्य किला है। इस पर अत्याधुनिक लड़ाकू विमान, मिसाइल डिफेंस सिस्टम और हजारों सैनिक तैनात हैं। अमेरिकी नौसेना की यह रणनीतिक चाल स्पष्ट रूप से इस क्षेत्र में अपने सहयोगियों (विशेषकर इजरायल) को सुरक्षा की गारंटी देने और विरोधियों को रणनीतिक दबाव में रखने के लिए है। पेंटागन के अनुसार, यह तैनाती क्षेत्र में “स्थिरता बनाए रखने” और “किसी भी हमले का तुरंत जवाब देने” की क्षमता को बढ़ाएगी।
ट्रंप के संकेत: बदल सकती है विदेश नीति
डोनाल्ड ट्रंप ने हालिया बयानों में संकेत दिया है कि उनके प्रशासन के तहत अमेरिका “शांति के माध्यम से शक्ति” (Peace through Strength) की नीति पर वापस लौटेगा। उन्होंने संकेत दिए हैं कि यदि स्थिति अनियंत्रित होती है, तो अधिक सैन्य संसाधनों को मिडिल ईस्ट की ओर मोड़ा जा सकता है। ट्रंप का रुख हमेशा से ही ‘अमेरिका फर्स्ट’ और कट्टरपंथ के खिलाफ सख्त रहा है, ऐसे में विमानवाहक पोतों की यह आवाजाही एक बड़े भू-राजनीतिक बदलाव की आहट मानी जा रही है।
वैश्विक असर और सुरक्षा चिंताएं
विवादित जलक्षेत्र में इस भारी सैन्य जमावड़े से अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्गों (जैसे स्वेज नहर और होर्मुज जलडमरूमध्य) की सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है। जानकारों का मानना है कि अमेरिका की यह बढ़ती सक्रियता रूस और चीन के लिए भी एक संदेश है कि वह मध्य-पूर्व में अपनी पकड़ ढीली नहीं होने देगा। फिलहाल, दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि इस सैन्य हलचल पर ईरान और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों की क्या प्रतिक्रिया होती है।