राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर बॉलीवुड की दो दिग्गज हस्तियों—अभिनेत्री व भाजपा सांसद कंगना रनौत और अभिनेत्री शर्मिला टैगोर—के विचार आमने-सामने आ गए हैं।
शर्मिला टैगोर का पक्ष हाल ही में शर्मिला टैगोर ने ‘वंदे मातरम्’ पर अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा था कि इस गीत के केवल शुरुआती दो छंदों को ही गाया जाना व्यावहारिक है। उनका मानना था कि आगे के छंदों में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है, जिन्हें एकेश्वरवादी (एक ईश्वर में विश्वास रखने वाले) धर्मों के अनुयायियों के लिए स्वीकार करना सहज नहीं हो सकता।
कंगना रनौत का जवाब कंगना रनौत ने शर्मिला टैगोर के इस बयान पर असहमति जताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी। कंगना ने कहा कि एक कलाकार के रूप में शर्मिला टैगोर के इस सीमित दृष्टिकोण को देखकर उन्हें हैरानी हुई है। उन्होंने अपील की कि इस विषय को ‘हिंदू-मुस्लिम’ के नजरिए से देखने के बजाय ‘सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता’ के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए। कंगना के अनुसार:
- स्वतंत्रता का प्रतीक: ‘वंदे मातरम्’ भारत के स्वतंत्रता संग्राम की भावना और देशभक्ति का प्रतीक है, न कि किसी विशेष धर्म का।
- व्यापक दृष्टिकोण: गीत में प्रयुक्त प्रतीकों और शब्दों को कलात्मक व सांस्कृतिक संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
‘वंदे मातरम्’ का ऐतिहासिक महत्व बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का एक प्रमुख संबल रहा है। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसे भारत के ‘राष्ट्रीय गीत’ का दर्जा दिया था, जबकि ‘जन गण मन’ को ‘राष्ट्रगान’ के रूप में स्वीकार किया गया था।
यह बहस एक बार फिर इस सवाल को रेखांकित करती है कि राष्ट्रीय प्रतीकों को धार्मिक संवेदनशीलता और देशभक्ति के संतुलन के बीच किस दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।