मोदी सरकार भारतीय राजनीति में एक युगांतकारी बदलाव की नींव रख रही है। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने की दिशा में तेजी से काम शुरू हो गया है। हालांकि यह आरक्षण 2024 के चुनावों में लागू नहीं हो पाया था, लेकिन केंद्र सरकार अब इसे 2029 के लोकसभा चुनावों तक धरातल पर उतारने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध नजर आ रही है।
इस ऐतिहासिक कानून के क्रियान्वयन के लिए जनगणना और परिसीमन (Delimitation) दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। नारी शक्ति वंदन अधिनियम की शर्तों के अनुसार, आरक्षण को लागू करने से पहले नई जनगणना का होना अनिवार्य है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, सरकार अगले दो से ढाई वर्षों के भीतर जनगणना की प्रक्रिया को पूरा करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। जनगणना के आंकड़े आने के बाद निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन यानी परिसीमन किया जाएगा, जिसके आधार पर महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण होगा।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम केवल एक राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि महिलाओं को नीति निर्माण की मुख्यधारा में लाने का एक ठोस वैधानिक प्रयास है। संविधान के 128वें संशोधन विधेयक के रूप में पारित यह कानून संसद और विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित करेगा। इसमें अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की महिलाओं के लिए भी कोटे के भीतर कोटे की व्यवस्था की गई है। सरकार का मानना है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम के प्रभावी होने से देश के लोकतांत्रिक ढांचे में समावेशिता बढ़ेगी और महिला नेतृत्व को नई ऊंचाई मिलेगी।
चुनाव आयोग भी इस विशाल कार्य के लिए अपनी तैयारियों में जुटा है। मतदाता सूचियों को नई जनगणना के आंकड़ों के साथ अपडेट करना और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय करना एक जटिल प्रक्रिया है। लेकिन जिस गति से मोदी सरकार नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नियमों को लागू करने की योजना बना रही है, उससे साफ है कि 2029 का आम चुनाव महिला प्रतिनिधित्व के मामले में ऐतिहासिक होने वाला है। इस कानून की सफलता से भारतीय लोकतंत्र न केवल और अधिक सशक्त होगा, बल्कि आधी आबादी को उनका वाजिब हक भी मिल सकेगा। अंततः, नारी शक्ति वंदन अधिनियम महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में ‘न्यू इंडिया’ की एक अमिट पहचान बनेगा।