इस्लामाबाद/वॉशिंगटन: वैश्विक राजनीति के गलियारों में हलचल तेज है क्योंकि पाकिस्तान एक बार फिर मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए अपनी चरमराई अर्थव्यवस्था को सहारा देने की कोशिश कर रहा है। ताजा खबरों के अनुसार, पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता आयोजित करने के बदले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन से आर्थिक मदद या वित्तीय लाभ प्राप्त करने की रणनीति बना रहा है।
इस्लामाबाद में शांति शिखर सम्मेलन की संभावना अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि ईरान के साथ परमाणु गतिरोध और क्षेत्रीय तनाव को समाप्त करने के लिए अगले दौर की बातचीत पाकिस्तान की राजधानी इस्लाबाद में हो सकती है। ट्रंप ने पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व, विशेषकर जनरल असीम मुनीर की भूमिका की सराहना की है। ट्रंप का मानना है कि वार्ता ऐसे देश में होनी चाहिए जिसका इस मामले में सीधा सरोकार हो और पाकिस्तान इस भूमिका के लिए उपयुक्त नजर आ रहा है।
पाकिस्तान का ‘फंड’ गेम विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान इस कूटनीतिक अवसर को अपनी आर्थिक बदहाली दूर करने के एक हथियार के रूप में देख रहा है। पाकिस्तान की कोशिश है कि वह ट्रंप प्रशासन को यह विश्वास दिलाए कि केवल वही ईरान और अमेरिका को एक मेज पर ला सकता है। इस मध्यस्थता के बदले में वह रुकी हुई अमेरिकी मदद, सैन्य सहायता और अंतरराष्ट्रीय ऋणों में रियायत की उम्मीद कर रहा है।
ईरान का कड़ा रुख और ‘हॉर्मुज’ का पेंच भले ही पाकिस्तान और अमेरिका वार्ता को लेकर उत्साहित दिख रहे हों, लेकिन ईरान का रुख अभी भी सख्त बना हुआ है। ईरान ने स्पष्ट किया है कि जब तक उसके जब्त किए गए फंड वापस नहीं किए जाते और लेबनान में संघर्ष विराम नहीं होता, तब तक ठोस समझौता मुश्किल है। वहीं, ट्रंप प्रशासन ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को पूरी तरह से व्यापार के लिए खोलने की शर्त रखी है। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर ईरान को ‘असफल देश’ बताते हुए दबाव बनाने की कोशिश की है।
निष्कर्ष पाकिस्तान के लिए यह स्थिति ‘दोधारी तलवार’ जैसी है। यदि वह इस शांति वार्ता को सफल बनाने में मदद करता है, तो उसे ट्रंप प्रशासन की ओर से बड़ा आर्थिक इनाम मिल सकता है। हालांकि, ईरान और अमेरिका के बीच गहरे अविश्वास को देखते हुए, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस्लाबाद वास्तव में किसी समझौते तक पहुँचने में सफल होता है या यह केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएगा।