नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से सोना न खरीदने, पेट्रोल-डीजल कम इस्तेमाल करने और विदेश यात्रा टालने जैसी 7 भावनात्मक अपीलें की हैं। प्रधानमंत्री की इन अपीलों के बाद देश में हलचल तेज हो गई है। आम जनता से लेकर आर्थिक विशेषज्ञों तक हर कोई एक ही सवाल पूछ रहा है— क्या भारत किसी बड़े आर्थिक संकट की ओर बढ़ रहा है?
वे 7 अपीलें जिन्होंने सबको चौंकाया
प्रधानमंत्री ने देश के विकास और विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने का हवाला देते हुए नागरिकों से सात प्रमुख आग्रह किए हैं:
- सोना न खरीदें: कम से कम एक साल तक सोने की खरीद से बचें।
- पेट्रोल-डीजल की बचत: निजी गाड़ियों का उपयोग कम करें और मेट्रो/पब्लिक ट्रांसपोर्ट अपनाएं।
- विदेश यात्रा टालें: राष्ट्रीय हित में एक साल तक विदेश न जाने का संकल्प लें।
- वर्क फ्रॉम होम (WFH): कंपनियों से आग्रह किया गया कि वे ईंधन बचाने के लिए फिर से घर से काम कराएं।
- खाद्य तेल का सीमित उपयोग: कुकिंग ऑयल की खपत कम करने की सलाह।
- खाद (Fertilizer) की बचत: किसानों से रासायनिक खादों का उपयोग कम करने का आग्रह।
- स्वदेशी को बढ़ावा: आयातित सामानों के बजाय स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता दें।
क्या यह अघोषित ‘आर्थिक लॉकडाउन’ है?
विपक्ष और कई विश्लेषकों का मानना है कि ये अपीलें किसी ‘अघोषित लॉकडाउन’ की तरह हैं। जहाँ सरकार लोगों की आवाजाही और खर्च करने की शक्ति (Spending Power) पर अंकुश लगाने की कोशिश कर रही है। वर्क फ्रॉम होम और विदेश यात्रा न करने के सुझाव सीधे तौर पर अर्थव्यवस्था की गति को धीमा कर सकते हैं। सवाल यह है कि क्या सरकार सप्लाई चेन और विदेशी मुद्रा (Forex Reserve) के मोर्चे पर इतनी कमजोर हो गई है कि उसे जनता से ऐसी मांग करनी पड़ रही है?
भीषण मंदी का संकेत?
आर्थिक जानकारों का कहना है कि दुनिया भर में जारी युद्ध (अमेरिका-ईरान तनाव) और सप्लाई चेन टूटने की वजह से कच्चे तेल और सोने की कीमतें आसमान छू रही हैं। भारत का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ रहा है। ऐसे में पीएम की अपीलें संकेत देती हैं कि सरकार आने वाले समय में एक भीषण मंदी की आशंका जता रही है और चाहती है कि जनता ‘बचत मोड’ में आ जाए ताकि देश दिवालिया होने जैसी स्थिति से बच सके।
सरकार का पक्ष
बीजेपी और सरकार के करीबियों का तर्क है कि यह कोई डर नहीं बल्कि ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना है। प्रधानमंत्री चाहते हैं कि वैश्विक संकट के समय भारत अपनी निर्भरता कम करे और ‘आत्मनिर्भर’ बने। यह नागरिकों को देश की अर्थव्यवस्था में भागीदार बनाने की एक कोशिश है।