डोनाल्ड ट्रम्प को करारा झटका: अमेरिकी कोर्ट ने 10% ग्लोबल टैरिफ को किया रद्द, 5 दिनों के भीतर रिफंड का आदेश!

वॉशिंगटन/न्यू न्यूयॉर्क: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आर्थिक नीतियों को एक बार फिर न्यायपालिका के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा है। न्यूयॉर्क स्थित फेडरल ट्रेड कोर्ट (U.S. Court of International Trade) ने राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा लगाए गए 10 प्रतिशत के वैश्विक टैरिफ (Global Tariff) को ‘अवैध’ घोषित करते हुए रद्द कर दिया है। कोर्ट ने न केवल इन आदेशों को असंवैधानिक बताया है, बल्कि प्रशासन को यह भी निर्देश दिया है कि वसूला गया शुल्क 5 दिनों के भीतर संबंधित कंपनियों को वापस (Refund) किया जाए।

कोर्ट ने क्यों रद्द किया फैसला?

राष्ट्रपति ट्रम्प ने ‘ट्रेड एक्ट 1974’ की धारा 122 (Section 122) का हवाला देते हुए यह टैरिफ लागू किया था। उनका तर्क था कि देश के व्यापार घाटे को कम करने के लिए यह जरूरी है। हालांकि, तीन जजों की बेंच ने 2-1 के बहुमत से दिए अपने फैसले में कहा कि राष्ट्रपति ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किया है। कोर्ट के अनुसार, धारा 122 का उपयोग केवल गंभीर ‘भुगतान संतुलन’ (Balance-of-Payments) संकट के समय किया जा सकता है, न कि सामान्य व्यापार घाटे को आधार बनाकर।

5 दिन में पैसा लौटाने का अल्टीमेटम

यह फैसला उन कंपनियों के लिए बड़ी जीत है जिन्होंने इस मनमाने टैक्स के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी थी। कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि जिन कंपनियों ने यह 10% अतिरिक्त शुल्क चुकाया है, सरकार उन्हें ब्याज सहित यह राशि वापस करे। रिपोर्ट के अनुसार, प्रशासन को रिफंड की प्रक्रिया शुरू करने के लिए केवल 5 दिनों का समय दिया गया है।

ट्रम्प की प्रतिक्रिया: “न्यायालय का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण”

इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए डोनाल्ड ट्रम्प ने इसे ‘पक्षपाती’ बताया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर जजों की आलोचना करते हुए कहा कि यह फैसला अमेरिकी उद्योगों को नुकसान पहुँचाएगा। ट्रम्प प्रशासन अब इस फैसले को ऊपरी अदालत (Appeals Court) में चुनौती देने की तैयारी कर रहा है।

भारत और अन्य देशों पर असर

ट्रम्प के इस 10% ग्लोबल टैरिफ का सीधा असर भारत, चीन और यूरोपीय देशों से होने वाले आयात पर पड़ रहा था। इस अदालती आदेश के बाद अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत में राहत की लहर है। जानकारों का मानना है कि यह फैसला न केवल ट्रम्प की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के लिए झटका है, बल्कि यह संदेश भी है कि राष्ट्रपति की शक्तियां कानून से ऊपर नहीं हैं।


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