कोलकाता/नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी के इतिहास और विचारधारा के लिए एक बेहद भावुक और ऐतिहासिक पल सामने आया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस मुकाम को हासिल किया है, जिसका सपना जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने देखा था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पीएम मोदी ने बंगाल में भाजपा की जड़ें मजबूत कर पार्टी के पितृपुरुष का ‘कर्ज’ उतार दिया है।
विचारधारा की जीत
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान’ के खिलाफ आवाज उठाई थी। उन्होंने अखंड भारत और कश्मीर के पूर्ण विलय का जो सपना देखा था, उसे मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 हटाकर पहले ही पूरा कर दिया था। लेकिन, मुखर्जी की अपनी जन्मभूमि यानी पश्चिम बंगाल में भाजपा का मुख्य शक्ति बनना बाकी था। हाल के वर्षों में भाजपा ने जिस तरह से बंगाल के कोने-कोने में अपनी पहुंच बनाई है, उसने यह साबित कर दिया है कि मुखर्जी के विचार आज भी बंगाल की जनता के बीच जीवित हैं।
शून्य से शिखर तक का सफर
एक समय था जब पश्चिम बंगाल में भाजपा की उपस्थिति नगण्य थी। वामपंथी किले और फिर तृणमूल कांग्रेस के वर्चस्व के बीच भाजपा के लिए राह आसान नहीं थी। हालांकि, प्रधानमंत्री मोदी की रैलियों और संगठनात्मक मजबूती के दम पर पार्टी ने राज्य में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका हासिल की। डॉ. मुखर्जी की धरती पर ‘कमल’ का खिलना केवल चुनावी जीत नहीं, बल्कि एक वैचारिक विजय के रूप में देखा जा रहा है।
पीएम मोदी का भावनात्मक जुड़ाव
प्रधानमंत्री मोदी अक्सर अपने भाषणों में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के योगदान का जिक्र करते हैं। उन्होंने बंगाल की जनता से हमेशा यह अपील की है कि वे उस महान सपूत के विजन को आगे बढ़ाएं जिसने देश की एकता के लिए अपना बलिदान दे दिया। बंगाल में भाजपा का बढ़ता वोट बैंक और सांगठनिक विस्तार इस बात का प्रमाण है कि पीएम मोदी ने मुखर्जी के अधूरे मिशन को अपनी प्राथमिकता बनाया।